<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222</id><updated>2012-02-16T18:19:56.818-08:00</updated><category term='कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियों से'/><category term='सूर्योपनिषद्‍'/><category term='भविष्योत्तरपुराण'/><category term='कुछ पुरानी पुस्तकों से'/><category term='वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड से'/><category term='कुछ प्राचीन पुस्तकों से उद्धृत'/><title type='text'>सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च</title><subtitle type='html'>आईये जानें मंत्रों की असीमित शक्ति को..हमारी अपनी ही संस्कृति.. हमारी अपनी विरासत...एक प्रयास इसे आप तक पहुंचाने का...श्रद्धा से सब संभव है।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>6</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222.post-9051124073873056261</id><published>2008-07-28T06:57:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T07:01:45.116-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ प्राचीन पुस्तकों से उद्धृत'/><title type='text'>लक्ष्म्यष्टक स्तोत्रम्</title><content type='html'>नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।&lt;br /&gt;शङ्ख चक्र गदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ते॥१॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नमस्ते गरुड़ारूढ़े कोलासुर भयङ्करि।&lt;br /&gt;सर्वपाप हरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥२॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयञ्करि।&lt;br /&gt;सर्व दुःख हरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥३॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि।&lt;br /&gt;मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥४॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।&lt;br /&gt;योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥५॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे।&lt;br /&gt;महापाप हरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥६॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पद्मासन स्थिते देवि परब्रह्म स्वरूपिणि।&lt;br /&gt;परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥७॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कार भूषिते।&lt;br /&gt;जगत्स्थिते  जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥८॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फलश्रुति&lt;br /&gt;महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान्नरः।&lt;br /&gt;सर्व सिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा॥९॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।&lt;br /&gt;द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्य समन्वितः॥१०॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।&lt;br /&gt;महालक्ष्मी भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥११॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-9051124073873056261?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/9051124073873056261/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=9051124073873056261' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/9051124073873056261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/9051124073873056261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html' title='लक्ष्म्यष्टक स्तोत्रम्'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222.post-6920145855925333974</id><published>2008-07-28T06:49:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T06:55:46.597-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भविष्योत्तरपुराण'/><title type='text'>स्तवराज</title><content type='html'>सुमन्तुरुवाच-&lt;br /&gt;अस्तावीच्च ततः साम्बः कृशो धमनिसन्ततः।&lt;br /&gt;राजन्नाम सहस्रेण सहस्रांशुं दिवाकरम्॥१॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खिद्यमानं ततो दृष्ट्वा सूर्यः कृष्णात्मजं सदा।&lt;br /&gt;स्वप्नेऽस्य दर्शनं दत्वा पुनर्वचनमब्रवीत्॥२॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीसूर्य उवाच-&lt;br /&gt;साम्ब साम्ब महाबाहो श्रृणु जाम्बवतीसुत।&lt;br /&gt;अलं नाम सहस्रेण पठ चेमं शुभं स्तवम्॥३॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानि गुह्यानि नामानि पवित्राणि शुभानि च।&lt;br /&gt;तानि ते कीर्तयिष्यामि प्रयत्नादवधारय॥४॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल स्तोत्र:&lt;br /&gt;वैकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।&lt;br /&gt;लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षुर्ग्रहेश्वरः॥५॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।&lt;br /&gt;तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्व वाहनः॥६॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेव नमस्कृतः।&lt;br /&gt;एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टस्स्दा मम॥७॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फलश्रुति-&lt;br /&gt;शरीरारोग्य दश्चैव धनवृद्धियशस्करः।&lt;br /&gt;स्तवराज इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥८॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;य एतेन महाबाहो द्वे सन्ध्येऽस्तमनोदये।&lt;br /&gt;स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥१०॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानसं वाधिकं वापि कायिकं यच्च दुष्कृतं।&lt;br /&gt;एक जाप्येन तत्सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः॥११॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एष जप्यश्च होमश्च संध्योपासनमेव च।&lt;br /&gt;बलिर्मन्त्रोऽर्धमन्त्रोऽथ धूपमन्त्रस्तथैव च॥१२॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।&lt;br /&gt;पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्व पापहरः शुभः॥१३॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एवमुक्त्वा स भगवान्भास्करो जगतांपतिः।&lt;br /&gt;आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत॥१४॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साम्बोपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्।&lt;br /&gt;प्रीतात्मा नीरुजः श्रीमांस्तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्॥१५॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-6920145855925333974?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/6920145855925333974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=6920145855925333974' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/6920145855925333974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/6920145855925333974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='स्तवराज'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222.post-245041852791770659</id><published>2007-08-03T22:29:00.001-07:00</published><updated>2008-07-28T07:20:38.855-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ पुरानी पुस्तकों से'/><title type='text'>प्रातः जागरण के पश्चात् स्नान से पूर्व के कृत्य</title><content type='html'>प्रातः काल उठने के बाद स्नान से पूर्व जो आवश्यक विभिन्न कृत्य है,शास्त्रों ने उनके लिये भी सुनियोजित विधि-विधान बताया है। गृहस्थ को अपने नित्य-कर्मों के अन्तर्गत स्नान से पूर्व के कृत्य भी शास्त्र निर्दिष्ट-पद्धति से ही करने चाहिये; क्योंकि तभी वह अग्रिम षट्-कर्मों के करने का अधिकारी होता है। अतएव यहाँ पर क्रमशः जागरण-कृत्य एवं स्नान-पूर्व कृत्यों का निरूपण किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्राह्म-मुहूर्त में जागरण--सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घंटे)पूर्व ब्राह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करावलोकन--आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।&lt;br /&gt;करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम् ॥&lt;br /&gt;(आचारप्रदीप)&lt;br /&gt;'हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, हाथ के मध्य में सरस्वती और हाथ के मूलभाग में ब्र्ह्मा जी निवास करते हैं, अतः प्रातः काल दोनों हाथों का अवलोकन करना चाहिये।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूमि-वन्दना-- शय्या से उठ कर पृथ्वी पर पैर रखने से पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें और उनपर पैर रखने की विवशता के लिये उनसे क्षमा माँगते हुए निम्न श्लोक का पाठ करें--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते ।&lt;br /&gt;विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'समुद्र्रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली,पर्वतरूप स्तनों से मण्डित भगवान् विष्णु की पत्नी पृथ्वीदेवि ! आप मेरे पाद-स्पर्श को क्षमा करें।'&lt;br /&gt;प्रातः स्मरणीय श्लोक&lt;br /&gt;निम्नलिखित श्लोकों का प्रातः काल पाठ करने से बहुत कल्याण होता है, जैसे--&lt;br /&gt;१-दिन अच्छा बीतता है,&lt;br /&gt;२- दुःस्वप्न,कलिदोष,शत्रु,पाप और भव के भय का नाश होता है,&lt;br /&gt;३- विष का भय नहीं होता,&lt;br /&gt;४- धर्म की वृद्धि होती है, अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता है,&lt;br /&gt;५-रोग नहीं होता,&lt;br /&gt;६-पूरी आयु मिलती है,&lt;br /&gt;७- विजय प्राप्त होती है,&lt;br /&gt;८- निर्ध्न धनी होता है,&lt;br /&gt;९- भूख-प्यास और काम की बाधा नहीं होती तथा&lt;br /&gt;१०- सभी बाधाओं से छुटकारा मिलता है इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणेशस्मरण--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं&lt;br /&gt;सिन्दूरपूर परिशोभित गण्ड्युग्मम् ।&lt;br /&gt;उद्दण्ड विघ्न परिखण्डन चण्डदण्ड-&lt;br /&gt;माखण्डलादि सुरनायक वृन्दवन्द्यम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अनाथों के बन्धु, सिन्दूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थल वाले(गाल वाले), प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्रादि देवों से नमस्कृत श्रीगणेश का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विष्णु स्मरण--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रातः स्मरामि भवभीति महार्तिनाशम्&lt;br /&gt;नारायणं गरूड़वाहनमब्जनाभम् ।&lt;br /&gt;ग्राहाभिभूत वरवारणमुक्तिहेतुं&lt;br /&gt;चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'संसार के भयरूपी महान् दुःख को नष्ट करने वाले, ग्राह से गजराज को मुक्त करने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदल के समान नेत्र वाले, पद्मनाभ गरुड़वाहन भगवान् श्रीनारायण का मैं प्रातः स्मरण करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवस्मरण--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रातः स्मरामि भवभीति हरं सुरेशं ।&lt;br /&gt;गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम्&lt;br /&gt;खट्वाङ्ग शूलवरदाभय हस्तमीशं&lt;br /&gt;संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसार के भय को नष्ट करने वाले, देवेश, गङ्गाधर, वृषभवाहन, पार्वतीपति, हाथ में खट्वाङ्ग एवं त्रिशूल लिये और संसार रूपी रोग का नाश करने के लिये अद्वितीय औषध-स्वरूप, अभय, एवं वरद मुद्रायुक्त हस्तवाले भगवान् शिव का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवी स्मरण--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रातः स्मरामि शरदिन्दुकरोज्ज्वलाभां&lt;br /&gt;सद्रत्नवन्मकरकुण्डलहारभूषाम्&lt;br /&gt;दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्रहस्तां&lt;br /&gt;रक्तोत्पलाभ चरणां भवती परेशाम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शरत्कालीन चन्द्रमा के समान उज्ज्वल आभावाली, उत्तम रत्नों से जटित मकरकुण्डलों तथा हारों से सुशोभित, दिव्यायुधों से दीप्त सुन्दर नीले हजार हाथों वाली, लाल कमल की आभा युक्त चरणों वाली भगवती दुर्गा देवी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूर्य स्मरण--&lt;br /&gt;प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं&lt;br /&gt;रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।&lt;br /&gt;सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं&lt;br /&gt;ब्रह्मा हरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सूर्य का वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद हैं। जो सृष्टि आदि के कारण हैं, ब्रह्मा और शिव के स्वरूप हैं तथा जिनका रूप अचिन्त्य और अलक्ष्य है, प्रातः काल मैं उनका स्मरण करता हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रिदेवों के साथ नवग्रहस्मरण--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी&lt;br /&gt;भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।&lt;br /&gt;गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः&lt;br /&gt;कुर्वन्तु सर्वे ममसुप्रभातम् ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु-- ये सभी मेरे प्रातः काल को मङ्गलमय करें।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-245041852791770659?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/245041852791770659/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=245041852791770659' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/245041852791770659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/245041852791770659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='प्रातः जागरण के पश्चात् स्नान से पूर्व के कृत्य'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222.post-6184217471968704457</id><published>2007-07-28T01:22:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T07:18:50.268-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूर्योपनिषद्‍'/><title type='text'>सूर्योपनिषद्‍</title><content type='html'>भगवान् सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। तत्वतः तो वे परब्रह्म हैं। वे स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त विश्व की आत्मा हैं। सूर्योपनिषद्‍ (१।४) के अनुसार सूर्य से ही सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है, पालन होता है एवं उन्हीं में विलय होता है। उनके उपासक साधक को स्वयं भी सूर्य में ब्रह्मात्मभावना करने का निर्देश दिया गया है -- ' यः सूर्योऽहमेव च।'&lt;br /&gt;भगवान आद्यशंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित पञ्चायतनोपासना में वे अन्यतम उपास्य हैं। उनकी उपासना का विधान वेदों में तो है ही उनके अतिरिक्त सूर्योपनिषद्‍, चाक्षुषोपनिषद्‍, अक्ष्युपनिषदादि उपनिषदें स्वतंत्र रूप से सूर्योपासना का विधान करती हैं।&lt;br /&gt;सूर्य समस्त नेत्र-रोग को(तथा अन्य सभी रोगों को भी) दूर करने वाले देवता हैं----'न तस्याक्षिरोगो भवति'(अक्ष्युपनिषद्‍) । 'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' आदि पुराण वचन इस विषय में परम प्रसिद्ध हैं। तो इन्हीं बातों और भगवान सूर्य नारायण की महत्ता को ध्यान में रखते हुए सूर्योपनिषद्‍ प्रस्तुत कर रहा हूँ।और ये आशा करता हूँ कि लोग लाभान्वित हों। आस्था से करें भगवान् सविता कल्याण करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरिः ॐ॥ अथ सूर्याथर्वाङ्गिरसं व्याख्यास्यामः । ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । आदित्यो देवता। हंसः सोऽहमग्निनारायणयुक्तं बीजं । हृल्लेखा शक्तिः । वियदादि सर्ग संयुक्तं कीलकम् । चतुर्विधपुरुषार्थ-सिद्ध्यर्थे विनियोगः । षट् स्वरारूढ़ेन बीजेन षडंगं रक्ताम्बुज संस्थितम् । सप्ताश्वरथितं हिरण्यवर्णम् चतुर्भुजम् पद्मद्वयाभयवरदहस्तं कालचक्र प्रणेतारं श्रीसूर्यनारायणम् य एवं वेद स वै ब्राह्मणः । ॐ भूर्भुवः सुवः । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा नमस्त आदित्य॒ ! त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्तासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्षं यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वासि । त्वमेव सर्व छन्दोऽसि । आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्यादापोजायन्ते । आदित्याज्ज्योयिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते । आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावदित्यो ब्रह्म॒ । आदियोऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहंकाराः ।आदित्यो वै व्यानः समानोदानोऽपानः प्राणः ।आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गानन्दाः । आनन्दमयो ज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः । नमो मित्राय भानवे मृत्योर्माम् पाहि । भ्राजिष्णवे विश्व हेतवे नमः । सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु । सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च । चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः । चक्षुर्धाता दधातु नः । आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । सविता पश्चात्तात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्तात्सविताधरात्तात् । सविता नः सुवतु सर्वतार्ति सविता नो रासतां दीर्घमायुः । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म। घृणिरिति द्वे अक्षरे । सूर्य इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य इति त्रीण्यक्षराणि । एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः । यः सदाहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति । स वै ब्राह्मणो भवति । सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधिभयात्प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात्पूतो भवति । अगम्यागमनात् पूतो भवति । पतितसम्भाषणात्पूतो भवति । मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत् । सद्योत्पन्नपञ्चमहापातकात्प्रमुच्यते । सैषां सावित्रीं विद्यां न किंचिदपि न कस्मैचित् प्रशंसयेत् । य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवाञ्जायते । पशून्विन्दति । वेदार्थाँल्लभते । त्रिकालमेतज्जप्त्वा क्रतुशतफलमवाप्नोति । यो हस्तादित्ये जपति स महामृत्युं तरति य एवं वेद ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिरिति शान्तिः ॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-6184217471968704457?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/6184217471968704457/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=6184217471968704457' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/6184217471968704457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/6184217471968704457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2007/07/blog-post_28.html' title='सूर्योपनिषद्‍'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6660290148191701222.post-7034662917841651159</id><published>2007-07-27T00:45:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T07:12:43.152-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियों से'/><title type='text'>विभिन्न देवी देवताओं के लिये गायत्री मन्त्र ||</title><content type='html'>प्राचीन भारतीय तन्त्र की कुछ पुस्तकों में गायत्री की महत्ता का उल्लेख है, लिखा है कि १०८ या १० बार के गायत्री जाप से महा पातकी व्यक्ति भी मुक्ति पा जाता है।यहाँ जो जप संख्या १०८ या १० बार गायत्री जप निर्दिष्ट किया गया है, वह शक्ताशक्त के लिये समझना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) विष्णु गायत्री - त्रैलोक्य-मोहनाय विद्महे काम-देवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२)नारायण गायत्री - नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३)नृसिंह गायत्री - वज्र नखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४)गोपाल गायत्री -कृष्णाय विद्महे दामोदराय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५)राम गायत्री - द्शरथाय विद्महे सीता वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(६)शिव गायत्री - तत्पुरुषाय विद्महे महा-देवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(७)गणेश गायत्री - दक्षिणामूर्तये विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(८)सूर्य गायत्री - आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१०)दुर्गा गायत्री - महा देव्यै विद्महे दुर्गायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(११)लक्ष्मी गायत्री - महा लक्ष्म्यै विद्महे महा - श्रियै धीमहि तन्नः श्रीः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१२)सरस्वती गायत्री - वाग्देव्यै विद्महे काम- राजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१३)अन्नपूर्णा गायत्री - भगवत्यै विद्महे माहेश्वर्यै धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णे प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१४)कालिका गायत्री - कालिकायै विद्महे श्मशान-वासिन्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१५)काम गायत्री - काम देवाय विद्महे पुष्प-बाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये विभिन्न गायत्री मन्त्र विभिन्न देवी देवताओं के हैं, जिनका जप यथाशक्ति और पूरी निष्ठा से किया जाये तो लाभ होना निश्चित है, संदेह का प्रश्न ही नहीं है।ये सर्वथा सुरक्षित मन्त्र हैं जिनका जप केवल स्नानादि से निवृत्त हो कर किया जा सकता है, और साधक चाहे तो अनुष्ठान भी कर सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-7034662917841651159?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/7034662917841651159/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=7034662917841651159' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/7034662917841651159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/7034662917841651159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2007/07/blog-post_27.html' title='विभिन्न देवी देवताओं के लिये गायत्री मन्त्र ||'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' 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भी कर लें तदुपरान्त कम से कम ११ बार पढ़ें पढ़ने से पहले हनुमान जी के रौद्र रूप का ध्यान करें,।फिर कार्य हेतु जायें,अवश्य कार्य सिद्धि होगी इसमें संशय नहीं।&lt;br /&gt;नोट: यदि किसी योग्य गुरु से वानरी मुद्रा का ज्ञान करलें तो लाभ शीघ्र मिलेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6660290148191701222-303165557969992843?l=tantrasaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tantrasaar.blogspot.com/feeds/303165557969992843/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6660290148191701222&amp;postID=303165557969992843' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/303165557969992843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6660290148191701222/posts/default/303165557969992843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tantrasaar.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='कार्य सिद्धि हेतु एक चमत्कारी मन्त्र'/><author><name>विभावरी रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17929447279673536929</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_b0KSajR3dj8/TTZ7r6y5jsI/AAAAAAAABZ4/s4cubB2cQlc/S220/Mahfil.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry></feed>
